काव्य कौमुदी ग़ज़ल/हज़ल

बारहा ख़ुद से पूछता हूँ मैं

रुद्र ‘रामिश’ II

बारहा ख़ुद से पूछता हूँ मैं!
क्या है ये ख़ल्क़* और क्या हूँ मैं!!

याद आई तेरी तो याद आया,
अब तुझे भूलने लगा हूँ मैं!!

इश्क़ ने भी जिसे नहीं पूछा,
हाँ,उसी ग़म का आसरा हूँ मैं!!

चश्म-ए-बेबाक का अदब तू है,
हुस्न-ए-बेपर्दा की हया हूँ मैं!!

जिसमें बहती है ख़ुद नदी ही नदीम*,
उस सफ़ीने का नाख़ुदा हूँ मैं!!

हो नहीं पाया ख़ुद मैं अपना ही,
फिर कहा किसने आपका हूँ मैं!!

जो सुनी जाये बन्द करके गोश, क़ल्बे-यज़दाँ की वो सदा हूँ मैं!!

ख़ल्क़~सृष्टि
नदीम~ दोस्त
गोश~ कान
क़ल्बे-यज़दाँ~ ईश्वर का हृदय)

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रुद्र प्रताप सिंह

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