अतुल मिश्र II
इधर, जैसे-जैसे होली करीब आ रही है, हमने खुद को समेटना शुरू कर दिया है हमने अभी से रंगों के दुष्प्रभाव पर रखे उस अखबारी लेख की कटिंग के मैटर का रियाज करना शुरू कर दिया, जिसे लेखक ने समाज में क्रांति लाने के लिहाज से लिखा था। हमने अपना जो मूड है, वो शीशे में ऐसा करके भी देख लिया कि अगर कोई रंग लगाने आ ही गया, तो हमें किस तरह उस सत्यवादी अखबार के हवाले से समझाना है कि रंग लगाना कितना खतरनाक है और होली होने के बावजूद हम इसे लगाने से क्यों इनकार कर रहे हैं।
होली पर हम यह भी नहीं चाहते कि अगर बाहर निकलें तो वे लोग, जो नमस्ते करने में भी इधर-उधर मुंह छिपा लिया करते हैं, वे आज दारू पीकर हमारे पैरों पड़ें और अंकल कह कर हमसे आशीर्वाद मांगें और बाद में यह भी उस घिसे हुए पुराने रिकार्ड की तरह दोहराएं कि हमसे कोई गलती हो गई हो तो माफ कर दें। अब जैसे वर्मा जी हैं। हर साल आते हैं रंग लगाने। कोई इस किस्म का रंग लगा जाते हैं कि हमें ठंड के बावजूद पत्थर से रगड़-रगड़ कर नहाना पड़ता है। इसके अलावा, वे अपनी पूरी शक्ति का प्रदर्शन हमसे गले मिलते वक़्त कर देते हैं कि अगर पड़ोसी होने के नाते कभी झगड़ा होने की नौबत आए तो हम उनकी खानदानी शफाखाने जैसी ताकत का स्मरण कर लें।
होली पर हम यह भी पसंद नहीं करते कि लोग बाग खुद तो अकेले होली मिलने आएं और हमसे पूछें कि भाभी जी नहीं दिखाई दे रहीं? हम नहीं चाहते कि हम भी गैर औरतों से अपने हिसाब से होली खेलें। फिर यह कैसे अच्छा लगेगा कि कोई हमारी बीवी के न दिखाई देने पर कोई सवाल करे कि वह क्यों नहीं दिखाई दे रही हैं? कई लोग, जो भांग पीकर गुजिया खाने के शौकीन होते हैं। वे पेट-संभव जितनी खा सकते हैं, उतनी तो खा ही लेते हैं, बाकी जेबों में रख कर ले जाते हैं कि अपनी बीवी को बताएंगे कि भाभी के हाथ की गुजिया कितनी अच्छी हैं, देखो।
हमने घर पर यह निर्देश भी दे रखे हैं कि कोई हमें पूछने आए तो कौन-कौन से बहाने करने हैं? मसलन, कहीं बाहर गए हैं या इतनी ज्यादा हालत खराब है कि आपके आने की सूचना भी अगर दे दी, तो हो सकता है, हालत और भी बिगड़ जाए या काफी देर पहले आपके घर की तरफ ही गए थे, बहुत देर से लौटे ही नहीं हैं। हमने बच्चों को यह भी समझा रखा है कि अंतिम वाले बहाने का इस्तेमाल सबसे पहले करना. जो लोग हमारी आदतों से वाकिफ हैं, वे फौरन अपने घरों की तरफ भागेंगे कि यार, इस बंदे ने किसी किस्म की होली न खेल ली हो हमारे घर पर। क्या करें, दुनिया ऐसी ही है, दोस्त।