कथा आयाम कहानी

आज मेरी सुबह हुई है…

राधिका त्रिपाठी II

उसके इस अचानक फैसले से पूरा परिवार सकते में आ गया। किसी को कुछ पता नहीं था कि बिन मां के इस लड़के से कौन शादी करेगा। अगर किसी लड़की ने कर भी ली तो क्या वो बाद में इसे संभाल पाएगी। परिवार के किसी भी सदस्य में इतनी हिम्मत नहीं थी कि उससे लड़की का नाम और कुल-गोत्र ही पूछ ले। बड़ी हिम्मत के बाद अमर की दादी उसके कमरे में आई और सिर पर हाथ फेरने लगी। धीरे से पूछा बाबू कौन है? और ये अचानक शादी। वह मुस्कुरा कर बोला, अचानक ही वह मुझे दिखाई दी दादी। जिंदगी में सब कुछ अचानक ही होता है। जैसे मेरी मां छोड़ कर चली गईं..!!
दादी जनाती थी कि अमर अपनी मां से बहुत प्यार करता था। बड़े होने पर भी वह मां के पास ही सोता। स्कूल छोड़ने जाते समय अमर की मां का एकसीडेंट हो गया। आखिरी सांस मां ने अमर की गोद में ली। अमर ने उस वक्त बस इतना ही पूछा, अब मैं कैसे रहूंगा मां? मां ने अपनी उखड़ती सांसों को रोक कर कहा था, वो आएगी न मेरी बहू, बिल्कुल मेरी तरह ही तुम्हें प्यार करेगी। और फिर मां की सांस हमेशा के लिए रुक गई।
उस क्षण के बाद अमर अपनी मां की परछाई सी लड़की ढूंढता रहा। मगर हर तरफ निराशा ही हाथ लगी उसे। अंत में उसने घर में बोल दिया कि वह शादी नहीं करेगा। अब इतने सालों बाद अचानक शादी का फैसला हैरान करने वाला था। शादी वाले दिन अमर ने घर को खूब सजाया नई बहू के स्वागत में। पूरा घर दुलहन बना हुआ था। इसके बाद दोपहर में वह कोर्ट मैरिज करने चला गया।
…दोनों तरफ से दो-दो गवाहों ने दस्तखत किए। और शादी हो गई। शाम को सभी सज-धज कर दरवाजे पर दुलहन का इंतजार कर रहे थे। तभी एक मैकरेलन 765 एलटी स्पाइडर कार आ कर दरवाजे पर रुकती है। और उसमें से अमर उतर कर जल्दी से गाड़ी का दरवाजा खोलता है। उसमें से सकुचाती हुई सुजाता उतरती है। उसकी आंखों में कई सवाल कि सब ठीक रहेगा न? अमर उसका हाथ कंधे पर रखता है और घर के अंदर चलने का इशारा करता है।
सुजाता जैसे ही अपना पैर अंदर जाने के लिए चौखट पर रखती है सभी उसे एकटक देखने लगते हैं। यह अधेड़ औरत अमर की पसंद है? बिलकुल अपनी अम्मा को ब्याह लाया है ये। कहां शहर का सबसे हैन्डसम और बिजनेस मैन लड़का कहां यह अम्मा…! उफ।
खैर किसी ने सामने तो कुछ नहीं कहा। मगर सारी रस्मों के बाद दादी जब सुजाता से मिलने आई और देख कर बोली, अमर तू तो अपनी मां की परछाई उठा लाया बाबू। अमर कुछ बोला नहीं। बस मुस्कुरा कर कहा, स्वागत योग्य कदम हैं इनके। अगली सुबह अमर के माथे को चूम कर सुजाता कहती है, उठिए। इस पर अमर उसके हाथ पकड़ कर बोला, ऐसे ही मेरी मां मुझे उठाती थी आज मेरी सुबह हुई है… जिंदगी की।

About the author

राधिका त्रिपाठी

राधिका त्रिपाठी हिंदी की लेखिका हैं। वे सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर बेबाक होकर लिखती हैं। खबरों की खबर रखती हैं। शायरी में दिल लगता है। कविताएं भी वे रच देती हैं। स्त्रियों की पहचान के लिए वे अपने स्तर पर लगातार संघर्षरत हैं। गृहस्थी संभालते हुए निरंतर लिखते जाना उनके लिए किसी तपस्या से कम नहीं है।

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